अभिव्यक्ति न्यूज़ : उत्तराखंड
समय का महत्व-अखिलेश चन्द्र चमोला ।स्वर्ण पदक प्राप्त ।राज्यपाल पुरस्कार तथा अनेकों राष्ट्रीय सम्मानोपाधियो से सम्मानित हिन्दी अध्यापक ।नशा उन्मूलन प्रभारी शिक्षा विभाग जनपद पौडी गढवाल ।किसी गाँव में एक व्यक्ति रहता था।वह प्रयास करता था कि मुझसे अच्छे कार्य हों ।मै किसी की मदद कर सकूँ,लेकिन दुर्भाग्य वश उसके अन्दर दूसरों के प्रति ईर्ष्या का भाव भी बना रहता था।अपने सामने किसी की उन्नति नहीं देख सकता था।इस प्रकार उसने पाप-पुण्य दोनों कार्य किये ।अन्त समय समीप आने पर उसे लेने देवदूत पहुँचे ।देवदूत ने कहा--तुमने ज्यादातर अच्छे कार्य किये हैं ।इसलिए मैं तुम्हें भाग्यरूपी पुस्तक दे रहा हूँ ।इसमें सभी के भाग्य का विवरण है ।तुम इसमें अपने एक पाप कार्य को पुण्य कार्य में बदल सकते हो,लेकिन यह परिवर्तन एक ही बार होगा ।उस व्यक्ति को जैसे ही पुस्तक मिली,वह अपने बारे में न जानकर अपने मित्र के भाग्य के बारे में जानने लगा ।उसने देखा कि मेरे मित्र के भाग्य में सुख लिखा है।उसे सहन नहीं हुआ ।वह उसमें परिवर्तन करने लगा ।तभी समय पूरा हुआ,देवदूत ने उससे पुस्तक अपने हाथ में ले ली।अब वह पछताने लगा ।समय मेरे अनुकूल था ।मैं अपने भाग्य को बदल सकता था।,लेकिन राग द्वेष के कारण दूसरे के पुण्य को पाप में बदलने लगा ।अपना बहुमूल्य समय गँवा बैठा।
समय का महत्व-अखिलेश चन्द्र चमोला ।स्वर्ण पदक प्राप्त ।राज्यपाल पुरस्कार तथा अनेकों राष्ट्रीय सम्मानोपाधियो से सम्मानित हिन्दी अध्यापक ।नशा उन्मूलन प्रभारी शिक्षा विभाग जनपद पौडी गढवाल ।किसी गाँव में एक व्यक्ति रहता था।वह प्रयास करता था कि मुझसे अच्छे कार्य हों ।मै किसी की मदद कर सकूँ,लेकिन दुर्भाग्य वश उसके अन्दर दूसरों के प्रति ईर्ष्या का भाव भी बना रहता था।अपने सामने किसी की उन्नति नहीं देख सकता था।इस प्रकार उसने पाप-पुण्य दोनों कार्य किये ।अन्त समय समीप आने पर उसे लेने देवदूत पहुँचे ।देवदूत ने कहा--तुमने ज्यादातर अच्छे कार्य किये हैं ।इसलिए मैं तुम्हें भाग्यरूपी पुस्तक दे रहा हूँ ।इसमें सभी के भाग्य का विवरण है ।तुम इसमें अपने एक पाप कार्य को पुण्य कार्य में बदल सकते हो,लेकिन यह परिवर्तन एक ही बार होगा ।उस व्यक्ति को जैसे ही पुस्तक मिली,वह अपने बारे में न जानकर अपने मित्र के भाग्य के बारे में जानने लगा ।उसने देखा कि मेरे मित्र के भाग्य में सुख लिखा है।उसे सहन नहीं हुआ ।वह उसमें परिवर्तन करने लगा ।तभी समय पूरा हुआ,देवदूत ने उससे पुस्तक अपने हाथ में ले ली।अब वह पछताने लगा ।समय मेरे अनुकूल था ।मैं अपने भाग्य को बदल सकता था।,लेकिन राग द्वेष के कारण दूसरे के पुण्य को पाप में बदलने लगा ।अपना बहुमूल्य समय गँवा बैठा।

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