परिश्रम ही सफलता की कुंजी---अखिलेश चन्द्र चमोला

अभिव्यक्ति न्यूज़ : उत्तराखंड 
परिश्रम ही सफलता की कुंजी---अखिलेश चन्द्र चमोला ।स्वर्ण पदक प्राप्त ।राज्यपाल पुरस्कार तथा अनेकों राष्ट्रीय सम्मानोपाधियो से सम्मानित ।हिन्दी अध्यापक तथा नशा उन्मूलन प्रभारी शिक्षा विभाग जनपद पौडी गढवाल ।महर्षि पाणिनी को संस्कृत व्याकरण का जनक माना जाता है ।बचपन में पाणिनि की गणना कमजोर छात्रों में की जाती थी।वे जिज्ञासु स्वभाव के व्यक्ति थे।एक दिन गुरु जी आश्रम में अध्ययन रत छात्रों की हाथ की रेखाएं देख रहे थे ।तभी पाणिनी ने भी अपना हाथ आगे बढ़ाया ।हाथ की रेखाएं देखते हुए गुरूजी ने कहा--तुम्हारी किस्मत में विद्या नहीं है ।पाणिनी ने कहा--गुरूदेव विद्या की रेखा कौन सी होती है?गुरूदेव ने पाणिनी को विद्या की रेखा की जानकारी दी।थोड़ी देर में पाणिनि ने पेन्सिल से अपने हाथ में गहरी रेखा बनाईं ।गुरू देव से कहा-मेरे हाथ में यह है विद्या की रेखा ।गुरू देव ने कहा यह कृतिम रेखा है।हाथ मे तुमने इसे स्वयं पेन्सिल ने बनाने का प्रयास किया है ।पाणिनी ने कहा गुरु देव में किस्मत से नहीं ,मेहनत से अपना भाग्य बदलूगा।पाणिनी ने अनवरत अध्ययन करके अपने ज्ञान को बढाया ।आगे चलकर भगवान शिव जी की कठोर तपस्या की।शिव भगवान पाणिनी की तपस्या से बहुत खुश हुए ।खुश होकर भगवान शिव ने नृत्य किया ।नृत्य के अंत में चौदह बार अपना डमरू बजाया । चौदह डमरू नादों के साथ पाणिनी को चौदह सूत्रों का उपदेश दिया ।शंकर भगवान द्वारा प्रदत्त ज्ञान से पाणिनी ने''अष्टाध्यायी ''नामक ग्रंथ लिख डाला ।इस ग्रंथ से पाणिनी की कीर्ति चारों ओर फैली।
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