अभिव्यक्ति न्यूज़ : उत्तराखंड
प्रातः काल दोनों ओर से युद्ध की तैयारी होने लगी ।कप्पू चौहान की मां ने देबू नाम के सेनानायक को बुलाया और कहा--अब जंग छिड़ गई है।इसे रोकना असम्भव है।लेकिन यदि दुर्भाग्य वश कप्पू चौहान राजा की गिरफ्त में आ जाता है,तो मुझे तत्काल सूचित कर देना ।जब हमारा गढ़ पति ही नहीं रहेगा ,तो हम भी अधीनता स्वीकार क्यों करें?दोनों सेनाओं में भंयकर युद्ध होने लगा। नया पुल बना दिया गया। उप्पूगढ़ को सेनाओं के द्वारा घेर लिया गया।कप्पू चौहान राजा की सेना पर भारी पड गया।कप्पू चौहान ने पल भर में ही राजा की सेना को पराजित कर दिया ।प्रसन्नता से अपने किले की ओर प्रस्थान करने लगा । नियति को कुछ और ही मंजूर था ।कप्पू चौहान का किला आग की लपटों से जल रहा था ।इस दृश्य को देखकर कप्पू चौहान के सेनानायक ने भंयकर युद्ध देखा।उस युद्ध की विभीषिका बहुत खतरनाक हो गई थी कि कप्पू चौहान की माता को लगा कि वे हार गये हैं ।उन्हें यह बात सहन नहीं हुई ।उन्होंने सम्पूर्ण किला जलाकर अपने प्राणों की आहुति दे दी ।कप्पू चौहान यह सब सहन नहीं कर पाया और वेहोश हो गया।कप्पू चौहान जब होश में आया ' तो उसने अपने आप को राजा अजयपाल के सामने पाया।राजा ने उसे प्रलोभन दिया कि तूम मेरी अधीनता स्वीकार कर लो और इस गढ़ के अधिपति के रूप में बने रहो।कप्पू चौहान ने निभीर्कता पूर्वक ऊॅचे स्वर में कहा--स्वाधीनता को खोकर मुझे किसी पद की लालसा नहीं है ।मैं अपना सिर किसी के आगे नहीं झुकाऊॅगा। अजयपाल को क्रोध आ गया है ।उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि तत्काल इसका सिर इस तरह से काटो कि वह मेरे पैरों में गिरे। कप्पू चौहान ने चुपके से दो मुट्ठी रेत अपने मुंह में रख दी ।जैसे सैनिकों ने उसकी गर्दन काटी उसने अपना सिर पीछे की ओर कर दिया ।सिर पीछे की ओर जा गिरा ।उसके मुंह की रेत अजयपाल के चेहरे पर गिरी ।यह दृश्य देखकर अजयपाल दंग रह गया ।बडे भावुक होकर कहने लगा कि--जीत तुम्हारी हुई है ।मैं हारा ।मैंने जीवन में कई योद्धा देखें,लेकिन तुम्हारे समान वीर पराक्रमी स्वाभिमानी आज तक किसी को नहीं देखा है ।मैं अजयपाल तुम्हारी इस अद्भुत बीरता को नमन करते हुए तुम्हारे चरणों की वन्दना करते हुए अपने माथा तुम्हारे आगे झुकाता हूँ । इस प्रकार राजाअजयपाल कप्पू चौहान की शवयात्रा में स्वयं पैदल गया ।अपने हाथों से चिता को अग्नि दी इस तरह से कप्पू चौहान भारतीय इतिहास में वीरता और मातृ भूमि के प्रति प्रेम के कारण सदा सदा के लिए अमर हो गया-लेखक अखिलेश चन्द्र चमोला ।स्वर्ण पदक विजेता ।राज्यपाल तथा अनेकों राष्ट्रीय सम्मानोपाधियो से सम्मानित हिन्दी अध्यापक के तथा नशा उन्मूलन प्रभारी शिक्षा विभाग जनपद पौडी गढवाल ।
मातृ भूमि के प्रति कप्पू चौहान का अनूठा प्रेम---लेखक-अखिलेश चन्द्र चमोला ।स्वर्ण पदक विजेता।राज्यपाल पुरस्कार तथा अनेकों राष्ट्रीय सम्मानोपाधियो से सम्मानित ।हिन्दी अध्यापक तथा नशा उन्मूलन प्रभारी शिक्षा विभाग जनपद पौडी गढवाल । गढवाल ' जो प्राचीन ग्रन्थों में स्वर्णभूमि,तपोभूमि',हिमवन्त,बद्रीकाश्रम,केदारखन्ड,उत्तराखंड के नाम से प्रसिद्ध है,पर्वतीय प्रदेश है।पर्वत शिखरों पर अनेक भग्नावशेष गढ़ों के कारण इसका नाम गढवाल पडा । सन् 1500ई0 की बात है ।अजयपाल गढवाल के राजा थे।अजयपाल ने सन् 1512में गढवाल की राजधानी देवलगढ़ से श्रीनगर स्थानांतरित की।इस संदर्भ में सभी गढ़पतियों को आमंत्रित किया ।अधिकांश गढ़पतियों ने इस आमन्त्रण को स्वीकार किया ।इन्हीं गढ़ों में उदयपुर परगने की जुबा पट्टी में पावन गंगा के तट पर स्थित ऊंचे शिखर पर उप्पूगढ़ स्थित था ।इस गढ़ का शासक कप्पू चौहान थ कप्पू चौहान के हृदय में मातृभूमि के प्रति प्रेम कूट कूट कर भरा हुआ था ।उन्हें किसी की अधीनता में रहना स्वीकार न था।कप्पू चौहान को अजयपाल ने संदेश दिया कि गढवाल के अधिकांश गढ़पतियों ने मेरी अधीनता स्वीकार कर ली है।आप भी मेरी अधीनता स्वीकार कर लें ।या तो युद्ध के लिए तैयार रहें ।इस सन्देश को पढकर कप्पू चौहान को अत्यधिक क्रोध आ गया ।तुरन्त इस तरह का संदेश भेज---मैं पशुओं में शेर हूँ ।पक्षियों में गरूण की भांति हूँ ।किसी की अधीनता स्वीकार नहीं करता ।झुकने की अपेक्षा मुझे मरना अच्छा लगता है ।जब तक शरीर में प्राण रहेगा ।तब तक लडने के लिए तैयार रहूंगा।अजयपाल उप्पूगढ़ पर आक्रमण करने के लिए एक बडी लेकर चल दिया । सायंकाल का समय था।कप्पू की मां नदी के उस पार बहुत बडी सेना को देखा।इसकी जानकारी अपने बेटे कप्पू चौहान को दी।कप्पू ने कहा '-माता जी यह सेना राजा अजयपाल की है।हमारे गढ़ पर आक्रमण करने आया है।उसे हमारी स्वतन्त्रता अच्छी नहीं लग रही है ।मां ने कहा-उस बिशाल सेना के साथ जीतना संभव नहीं है ।इस स्थिति में समझौता करना ही बेहतर है ।कप्पू चौहान ने कहा--जीवन आराम और सुख सुविधा के लिए नहीं मिला है ।मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति देना भी अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि है ।मैं रहूं,न रहूँ ।मेरा किला जीवित रहना चाहिए ।कप्पू चौहान घर से निकला ।तुरन्त झूला पुल को काटकर गंगा नदी में फेंक दिया ।मन ही मन प्रसन्न हो उठा कि मेरा किला सुरक्षित है ।शत्रु अब सरलता गंगा पार नहीं आ सकेंगे ।
प्रातः काल दोनों ओर से युद्ध की तैयारी होने लगी ।कप्पू चौहान की मां ने देबू नाम के सेनानायक को बुलाया और कहा--अब जंग छिड़ गई है।इसे रोकना असम्भव है।लेकिन यदि दुर्भाग्य वश कप्पू चौहान राजा की गिरफ्त में आ जाता है,तो मुझे तत्काल सूचित कर देना ।जब हमारा गढ़ पति ही नहीं रहेगा ,तो हम भी अधीनता स्वीकार क्यों करें?दोनों सेनाओं में भंयकर युद्ध होने लगा। नया पुल बना दिया गया। उप्पूगढ़ को सेनाओं के द्वारा घेर लिया गया।कप्पू चौहान राजा की सेना पर भारी पड गया।कप्पू चौहान ने पल भर में ही राजा की सेना को पराजित कर दिया ।प्रसन्नता से अपने किले की ओर प्रस्थान करने लगा । नियति को कुछ और ही मंजूर था ।कप्पू चौहान का किला आग की लपटों से जल रहा था ।इस दृश्य को देखकर कप्पू चौहान के सेनानायक ने भंयकर युद्ध देखा।उस युद्ध की विभीषिका बहुत खतरनाक हो गई थी कि कप्पू चौहान की माता को लगा कि वे हार गये हैं ।उन्हें यह बात सहन नहीं हुई ।उन्होंने सम्पूर्ण किला जलाकर अपने प्राणों की आहुति दे दी ।कप्पू चौहान यह सब सहन नहीं कर पाया और वेहोश हो गया।कप्पू चौहान जब होश में आया ' तो उसने अपने आप को राजा अजयपाल के सामने पाया।राजा ने उसे प्रलोभन दिया कि तूम मेरी अधीनता स्वीकार कर लो और इस गढ़ के अधिपति के रूप में बने रहो।कप्पू चौहान ने निभीर्कता पूर्वक ऊॅचे स्वर में कहा--स्वाधीनता को खोकर मुझे किसी पद की लालसा नहीं है ।मैं अपना सिर किसी के आगे नहीं झुकाऊॅगा। अजयपाल को क्रोध आ गया है ।उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि तत्काल इसका सिर इस तरह से काटो कि वह मेरे पैरों में गिरे। कप्पू चौहान ने चुपके से दो मुट्ठी रेत अपने मुंह में रख दी ।जैसे सैनिकों ने उसकी गर्दन काटी उसने अपना सिर पीछे की ओर कर दिया ।सिर पीछे की ओर जा गिरा ।उसके मुंह की रेत अजयपाल के चेहरे पर गिरी ।यह दृश्य देखकर अजयपाल दंग रह गया ।बडे भावुक होकर कहने लगा कि--जीत तुम्हारी हुई है ।मैं हारा ।मैंने जीवन में कई योद्धा देखें,लेकिन तुम्हारे समान वीर पराक्रमी स्वाभिमानी आज तक किसी को नहीं देखा है ।मैं अजयपाल तुम्हारी इस अद्भुत बीरता को नमन करते हुए तुम्हारे चरणों की वन्दना करते हुए अपने माथा तुम्हारे आगे झुकाता हूँ । इस प्रकार राजाअजयपाल कप्पू चौहान की शवयात्रा में स्वयं पैदल गया ।अपने हाथों से चिता को अग्नि दी इस तरह से कप्पू चौहान भारतीय इतिहास में वीरता और मातृ भूमि के प्रति प्रेम के कारण सदा सदा के लिए अमर हो गया-लेखक अखिलेश चन्द्र चमोला ।स्वर्ण पदक विजेता ।राज्यपाल तथा अनेकों राष्ट्रीय सम्मानोपाधियो से सम्मानित हिन्दी अध्यापक के तथा नशा उन्मूलन प्रभारी शिक्षा विभाग जनपद पौडी गढवाल ।
मातृ भूमि के प्रति कप्पू चौहान का अनूठा प्रेम---लेखक-अखिलेश चन्द्र चमोला ।स्वर्ण पदक विजेता।राज्यपाल पुरस्कार तथा अनेकों राष्ट्रीय सम्मानोपाधियो से सम्मानित ।हिन्दी अध्यापक तथा नशा उन्मूलन प्रभारी शिक्षा विभाग जनपद पौडी गढवाल । गढवाल ' जो प्राचीन ग्रन्थों में स्वर्णभूमि,तपोभूमि',हिमवन्त,बद्रीकाश्रम,केदारखन्ड,उत्तराखंड के नाम से प्रसिद्ध है,पर्वतीय प्रदेश है।पर्वत शिखरों पर अनेक भग्नावशेष गढ़ों के कारण इसका नाम गढवाल पडा । सन् 1500ई0 की बात है ।अजयपाल गढवाल के राजा थे।अजयपाल ने सन् 1512में गढवाल की राजधानी देवलगढ़ से श्रीनगर स्थानांतरित की।इस संदर्भ में सभी गढ़पतियों को आमंत्रित किया ।अधिकांश गढ़पतियों ने इस आमन्त्रण को स्वीकार किया ।इन्हीं गढ़ों में उदयपुर परगने की जुबा पट्टी में पावन गंगा के तट पर स्थित ऊंचे शिखर पर उप्पूगढ़ स्थित था ।इस गढ़ का शासक कप्पू चौहान थ कप्पू चौहान के हृदय में मातृभूमि के प्रति प्रेम कूट कूट कर भरा हुआ था ।उन्हें किसी की अधीनता में रहना स्वीकार न था।कप्पू चौहान को अजयपाल ने संदेश दिया कि गढवाल के अधिकांश गढ़पतियों ने मेरी अधीनता स्वीकार कर ली है।आप भी मेरी अधीनता स्वीकार कर लें ।या तो युद्ध के लिए तैयार रहें ।इस सन्देश को पढकर कप्पू चौहान को अत्यधिक क्रोध आ गया ।तुरन्त इस तरह का संदेश भेज---मैं पशुओं में शेर हूँ ।पक्षियों में गरूण की भांति हूँ ।किसी की अधीनता स्वीकार नहीं करता ।झुकने की अपेक्षा मुझे मरना अच्छा लगता है ।जब तक शरीर में प्राण रहेगा ।तब तक लडने के लिए तैयार रहूंगा।अजयपाल उप्पूगढ़ पर आक्रमण करने के लिए एक बडी लेकर चल दिया । सायंकाल का समय था।कप्पू की मां नदी के उस पार बहुत बडी सेना को देखा।इसकी जानकारी अपने बेटे कप्पू चौहान को दी।कप्पू ने कहा '-माता जी यह सेना राजा अजयपाल की है।हमारे गढ़ पर आक्रमण करने आया है।उसे हमारी स्वतन्त्रता अच्छी नहीं लग रही है ।मां ने कहा-उस बिशाल सेना के साथ जीतना संभव नहीं है ।इस स्थिति में समझौता करना ही बेहतर है ।कप्पू चौहान ने कहा--जीवन आराम और सुख सुविधा के लिए नहीं मिला है ।मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति देना भी अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि है ।मैं रहूं,न रहूँ ।मेरा किला जीवित रहना चाहिए ।कप्पू चौहान घर से निकला ।तुरन्त झूला पुल को काटकर गंगा नदी में फेंक दिया ।मन ही मन प्रसन्न हो उठा कि मेरा किला सुरक्षित है ।शत्रु अब सरलता गंगा पार नहीं आ सकेंगे ।

0 Comments:
Post a Comment