मलेता की गूल -ऐतिहासिक दास्तान-लेखक----अखिलेश चन्द्र चमोला

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मलेता की गूल -ऐतिहासिक दास्तान-लेखक----अखिलेश चन्द्र चमोला ।स्वर्ण पदक प्राप्त ।राज्यपाल पुरस्कार तथा अनेकों राष्ट्रीय सम्मानोपाधियो से सम्मानित हिन्दी अध्यापक तथा नशा उन्मूलन प्रभारी शिक्षा विभाग जनपद ।  उत्तराखंड का अपना गौरव मय इतिहास रहा है ।इसकी पावन धरती पर समय समय पर दिव्य महापुरुषों का अवतरण हुआ है ।जिन्होंने जन लोक कल्याणकारी कार्यों के लिए अपना समूचा जीवन समर्पित किया है ।इसी तरह की विभूतियों में माधो सिंह भन्डारी का नाम बड़े ही गौरव के साथ लिया जाता है ।                      माधो सिंह भन्डारी श्रीनगर के राजा महीपत शाह के सेनापति थे।अपनी कार्य कुशलता,आदर्श चरित्र व नैतिक व्यवहार के लिए पूरे राज्य में चर्चित थे।राजा उनके आचरण से बडे प्रभावित थे।अन्य कर्मचारियों को भी उन्हीं की तरह बनने की सलाह देते थे।एक बार राजा का दिवान सही समय पर दरबार में उपस्थित नहीं हुआ ।राजा ने उसे डाट-फटकार लगाकर कहा---माधो सिंह भन्डारी के साथ रहने पर भी तुम्हारे भीतर अच्छे गुण नहीं आ रहे हैं ।दरबार में कभी भी समय पर नहीं पहुंचते हो।यदि तुम्हारी कार्य के प्रति इसी तरह की उदासीनता रही,तो तुम्हें दरबार से हटा दिया जायेगा ।दीवान चापलूसी भरी बातें कहने लगा-महाराज मैं क्या करूँ?मुझे अपने घर में स्वयं भोजन बनाना पडता है ।सारी व्यवस्थाएं जुटानी पडती हैं ।माधो सिंह भन्डारी को बन बनाया खाना मिल जाता है ।इस कारण वह सही समय पर पहुंच जाता है ।राजा ने यह बात माधो सिंह भन्डारी को बताई।माधो सिंह भन्डारी को बहुत दुःख हुआ ।माधो सिंह भन्डारी में स्वाभिमान की भावना कूट कूट कर भरी हुई थी।इसे अपने स्वाभिमान के खिलाफ समझते हुए माधो सिंह ने दरबार से छुट्टी लेकर अपने घर को चल दिया ।घर पहुंचने माधो सिंह भन्डारी की भाभी उसे खाना परोसने लगी।खाने में केवल रोटी को देखकर माधो सिंह दाल व शब्जी की मांग करने लगा।माधो सिंह भन्डारी की भाभी ने गुस्से में आकर कहा-तुम्हें दाल शब्जी की मांग करते हुए शर्म नहीं आ रही है ।तुम्हें पता नहीं कि तुम्हारे गाँव मलेथा में पानी की कितनी समस्या है।सारे सारे खेत पानी के अभाव में बंजर पडे हुए हैं ।हिम्मत है तो पहले पानी की व्यवस्था करो।तभी तुम्हें दाल और शब्जी मिल जायेगी।यह सुनकर माधो सिंह को अजीब लगा ।मन ही मन सोचने लगे -भाभी जी का कहना बिलकुल सही है।पूरे क्षेत्र में एकमात्र हमारा ही गाँव ऐसा है,जहाँ पानी की समस्या है।दूसरे दिन माधो सिंह ने  अपनी भाभी से कहा---आप चिंता मत करो  ।मैं अपने गांव में  पानी की गूल लाऊंगा।इसके लिए मुझे कितना ही प्रयास क्यों न करना पडे ,मैं करूँगा ।हमारे गाँव के सारे खेत हरे भरे दिखाई देने लगेंगे।भाभी ने प्रति उत्तर में कहा---वह समय बतायेगा,तुम पुरूष हो,तुम्हारे अन्दर अदम्य साहस भरा हुआ है ।तुम्हारे लिए असम्भव कुछ भी नहीं है ।पुरुषार्थ से क्या नहीं प्राप्त किया जा सकता है ?भाभी की इस तरह की प्रेरणा दायनी बातों से माधो सिंह को ऊर्जा मिली।एकांत  स्थान में जाकर सोचने लगा ।तभी उसकी दृष्टि एक चूहे पर पडी।वह बडी तल्लीनता से अपने लिए बिल बना रहा था।माधो सिंह को लगा कि जब एक चूहा इतना बडा  बिल बना सकता है ।तो क्या मै एक सुरंग  नहीं बना सकता ?माधो सिंह ने पहाड़ पर सुरंग बनाना शुरू कर दिया ।उसके इस कार्य को देखकर गाँव वाले उसका उपहास करने लगे ।आपस में उसकी हंसी उड़ाते हुए परस्पर कहने लगे आज तक पहाड पर कौन सुरंग बना पाया है?माधो सिंह उत्साह के साथ सुरंग बनाने में लगा रहा।उसके साहस को देखकर गाँव वाले भी सहयोग करने लगे ।                     घर पर 11वर्ष का इकलौता पुत्र था ।उसका नाम गजेसिंह था।एक दिन गजेसिंह ने भी पिता के साथ  चलने की जिद्द की।मां के बार बार  मना करने का गजेसिंह पर असर नहीं हुआ ।सुरंग खोदने चला गया।दुर्भाग्य वश एक बहुत बड़ा पत्थर गजेसिंह के ऊपर जा गिरा ।गजेसिंह पंचतत्व में विलीन हो गया ।पुत्र की मृत्यु होने पर भी माधो सिंह भन्डारी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुआ ।लगातार कठोर परिश्रम करके पहाड़ पर छेद करके गूल का निर्माण पूरा किया ।मलेथा गाँव में पानी बहने लगा ।चारों ओर हरियाली के दर्शन होने लगे ।पूरे क्षेत्र में इस तरह के ऐतिहासिक कार्य करके माधो सिंह भन्डारी सदा सदा के लिए अमर हो गये।
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